27 साल बाद ऑफिस में धूम्रपान की आदत

खुली खिड़की और राखदानी के साथ बिखरी हुई ऑफिस डेस्क

मुझे जो ऑफिस याद है, उसमें बेज रंग का कीबोर्ड था, खिड़की की चौखट पर एक भारी काँच की राखदानी थी, और एक खिड़की थी जो कभी पूरी तरह बंद नहीं होती थी. सुबह 10 बजे तक कमरे में पिछले दिन के धुएँ की गंध बची रहती थी. मैं दो ईमेलों का जवाब देता, राखदानी में राख झाड़ता, फिर एक और का जवाब देता, और उसके बाद कॉफी के लिए उठता, जबकि सिगरेट पहले से मेरी उँगलियों में दबी होती. मैंने 19 साल की उम्र में धूम्रपान शुरू किया था. उस समय मैं 52 साल का था, और मैं ऐसे काम करता था जैसे सिगरेट का मेज पर उतना ही हक था जितना स्टेपलर का.

अब कोई इसे लेकर हंगामा नहीं करता था. यही बेचैन करने वाली बात थी, हालांकि तब मुझे यह समझ नहीं आया था. आदत ऑफिस में इतनी घुल-मिल गई थी कि मैं भी यह देखना बंद कर चुका था कि मैं कितनी बार पैक की तरफ हाथ बढ़ाता हूँ.

कमरा मेरे मुताबिक ढल गया

मैं पहले सोचता था कि काम के दौरान धूम्रपान तनाव की वजह से होता है. डेडलाइन. मुश्किल कॉल. लंबी मीटिंग के बाद मिलने वाली छोटी-सी राहत. इनमें से कुछ सच थे. बाकी ज़्यादातर बस दिनचर्या थी, जो सूट और टाई पहनकर घूम रही थी.

मेरा डेस्क खिड़की के सामने था. सिगरेट का पैक मॉनिटर के पास पड़ा रहता था. पेपर क्लिप्स के जार के बगल में लाइटर पड़ा रहता था. मैंने उसे जानबूझकर उस तरह नहीं रखा था. यह उसी तरह हुआ जैसे आदतें हमेशा बनती हैं, एक-एक छोटी सहूलियत से. जल्द ही कमरे का वह पूरा कोना मेरी तरतीब को मुझसे बेहतर जानने लगा.

सहकर्मी कुछ पूछने के लिए झुकते, बात करते रहते, फिर पीछे हट जाते. कोई चौंकता नहीं था. कोई यह नहीं कहता था कि अब काफी हो गया. ऑफिस की धूम्रपान संस्कृति कोई नारा नहीं थी. वह चुप्पी थी. यह लोगों का मेरी जैकेट पर लगी गंध, काँच के पास उठते धुएँ, और पाँच मिनट के वे गायब हो जाने वाले पलों के आदी हो जाना था जो पाँच मिनट से ज़्यादा चले जाते थे. जब कोई जगह आपकी आदत का विरोध करना बंद कर देती है, तब आप भी उसे सवाल करना छोड़ देते हैं.

मेरे सबसे बुरे दौर में मैं दिन में लगभग 40 सिगरेट पीता था. इनमें से सब काम पर नहीं होती थीं, लेकिन काम इस आदत को ढाँचा देता था. पहुँचो. एक सिगरेट जलाओ. एक काम खत्म करो. फिर एक सिगरेट. कॉफी. फिर एक सिगरेट. मुश्किल फोन कॉल. फिर एक सिगरेट. घर पहुँचने तक यह रस्म आधा दर्जन बार खुद को दोहरा चुकी होती थी.

वहाँ छोड़ना इतना दूर क्यों लगा

ऑफिस खतरनाक नहीं लगता था. वह कारगर लगता था. जाल इसी तरह टिकता है.

मैं गले में अपराधबोध लिए किसी इमारत के पीछे छिपकर धूम्रपान नहीं कर रहा था. मैं अपनी ही डेस्क पर, अपनी ही राखदानी के साथ, वही कर रहा था जो सामान्य बन चुका था. ऐसी छूट के आसपास एक अजीब-सा सुकून पनपता है. आदत निर्भरता कम और आपके पेशेवर दिन का हिस्सा ज़्यादा लगने लगती है, जैसे कैलेंडर देखना या मग फिर से भरना.

इसका मेरे दिमाग पर कुछ असर पड़ा. इसने छोड़ना दूर, लगभग सैद्धांतिक बना दिया. घर में धूम्रपान भावनाओं से जुड़ा था. ऑफिस में दोहराव था. दोहराव से बहस करना कठिन होता है, क्योंकि वह तटस्थ दिखता है.

मैंने यह सबसे साफ़ साधारण मंगलवारों पर देखा. न बुरे दिन. न संकट के दिन. बस ईमेल, कॉल, कागज़ और एक के बाद एक सिगरेट से भरे लंबे, सपाट दिन, क्योंकि कमरा हर सिगरेट को ठहरने की जगह दे रहा था. दिन में तीन घंटे धूम्रपान कागज़ पर बुरा लगता है. रोज़मर्रा में यह छोटी-छोटी छूटों के भीतर छिप जाता है.

उन वर्षों में मैंने छोड़ने की कोशिश की. पैच. सम्मोहन. थेरेपी. एलन कैर की किताब. यहाँ तक कि वे महीने भी जब मैं फोन में हर सिगरेट का समय नोट करता था. मैं हमेशा ऑफिस को बस पृष्ठभूमि का हिस्सा मानता रहा. वह कोई छोटी बात नहीं थी. वह उन मंचों में से एक था जहाँ आदत सबसे अच्छी तरह अपनी भूमिका निभाती थी.

वह दोपहर जब मैंने आखिरकार इसे देखा

जो पल मेरे साथ रह गया, वह नाटकीय नहीं था. मेरे डेस्क पर खड़ा एक सहकर्मी इनवॉइस की एक साधारण समस्या समझा रहा था. मैं राखदानी में जलती सिगरेट रखे था, जबकि वह पन्ने पर नंबरों की ओर इशारा कर रहा था. उसने एक बार रुककर खिड़की को थोड़ा और खोल दिया, फिर ऐसे बोलता रहा जैसे कुछ असामान्य हुआ ही नहीं.

उस छोटी-सी हरकत ने मुझे किसी भी नसीहत से ज्यादा झकझोर दिया.

वह नाराज़ नहीं था. वह मुझे जज नहीं कर रहा था. वह बस मेरी आदत के अनुसार कमरे को ढाल रहा था, ठीक वैसे ही जैसे सालों से बाकी सब कर रहे थे. मैं भी. मैंने अपनी मेज, अपने ब्रेक, अपनी एकाग्रता, और यहाँ तक कि अपनी बैठने की मुद्रा तक को सिगरेट के इर्द-गिर्द इतनी सावधानी से व्यवस्थित कर लिया था कि पूरा ऑफिस उस नृत्य-क्रम को सीख चुका था.

उसके जाने के बाद मैंने खिड़की की चौखट देखी. कोने में धूसर राख. पुराने धातु के फ्रेम पर जलने के निशान. कीबोर्ड के बगल में पैक. सब कुछ घिसा-पिटा और थका हुआ लग रहा था. न विद्रोही. न सुखद. बस पुराना.

यही मोड़ था. मैंने काम पर धूम्रपान को निजी सुकून समझना बंद किया और इसे एक ऐसी दिनचर्या के रूप में देखना शुरू किया जिसने उस जगह पर कब्ज़ा कर लिया था जहाँ मैं अपनी जागी हुई ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा बिताता था. एक बार यह दिख गया, तो छोड़ना नैतिक सुधार की किसी अमूर्त बात जैसा नहीं रहा; वह जगह वापस पाने की एक व्यावहारिक कोशिश लगने लगी.

ऑफिस ने मुझे ज़बरदस्ती नहीं फँसाया था. उसने मुझे परिचितपन से फँसाया था.

यही वह हिस्सा था जिसे मैं सालों तक नहीं देख पाया. आदत को ताक़तवर बने रहने के लिए नाटक की ज़रूरत नहीं होती. कभी-कभी उसे बस एक डेस्क, एक खिड़की, और इतने लगातार दिन चाहिए होते हैं कि फिर कोई ध्यान ही न दे.

मुझे वह कमरा आज भी याद है. बेज रंग का कीबोर्ड. वह खिड़की जो कभी ठीक से बंद नहीं होती थी. राखदानी जो फर्नीचर जितनी स्थायी लगती थी. जब मैं सोचता हूँ कि छोड़ना इतने लंबे समय तक दूर क्यों लगा, तो सबसे पहले वही मेज याद आती है. असल समस्या सिर्फ निकोटिन नहीं थी. समस्या यह थी कि आदत को वहाँ इतनी पूरी तरह बसने दिया गया था.

अगर काम के दौरान धूम्रपान आपके दिन का स्थायी हिस्सा बन गया है, तो एक और नियम अक्सर अकेले काफी नहीं होता. J. Freeman अपनी गाइड में वह शांत रास्ता दिखाते हैं, उन लोगों के लिए जो हर कार्यदिवस को संघर्ष बनाए बिना इस दफ्तर की आदत को पीछे छोड़ना चाहते हैं.

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